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Monday, June 20, 2016

OM ॐ के 11 शारीरिक लाभ:

*ॐ के 11 शारीरिक लाभ:*

*ॐ* : _ओउम् तीन अक्षरों से बना है.._
                *_अ उ म् ।_*

🔸 *"अ"*  _का  अर्थ  है उत्पन्न  होना,_
🔸 *"उ"*  _का  तात्पर्य  है  उठना,  उड़ना  अर्थात्  विकास,_
🔸 *"म"*  _का  मतलब  है  मौन  हो  जाना  अर्थात्  "ब्रह्मलीन"  हो  जाना।_

👉  *ॐ*  सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है।
👉  *ॐ* का उच्चारण शारीरिक लाभ प्रदान करता है।

👉जानीए
*ॐ* कैसे है स्वास्थ्यवर्द्धक और अपनाएं आरोग्य के लिए *ॐ* के उच्चारण का मार्ग...

           
🔺01. *ॐ* और थायराॅयडः-
*ॐ* का उच्‍चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो थायरायड ग्रंथि पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

🔺02. *ॐ* और घबराहटः-
अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।

🔺03. *ॐ* और तनावः-
यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।

🔺04. *ॐ* और खून का प्रवाहः-
यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।

🔺05. *ॐ* और पाचनः-
ॐ के उच्चारण से पाचन शक्ति तेज़ होती है।

🔺06. *ॐ* लाए स्फूर्तिः-
इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।

🔺07. *ॐ* और थकान:-
थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।

🔺08. *ॐ* और नींदः-
नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चिंत नींद आएगी।

🔺09. *ॐ* और फेफड़े:-
कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है।

🔺10. *ॐ* और रीढ़ की हड्डी:-
ॐ के पहले शब्‍द का उच्‍चारण करने से कंपन पैदा होती है। इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।

🔺11. *ॐ* दूर करे तनावः-
ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।

आशा  है  आप  इसे  उन  लोगों  तक  भी  जरूर  पहुंचायेगे  जिनसे  आप  प्यार   करते  हैं  और  जिनकी  आपको  फिक्र है ।

🌿 *।।  पहला  सुख  निरोगी  काया  ।।*🌿

Tuesday, June 14, 2016

A UNIQUE CASTE SYSTEM OF SINDHIS

A UNIQUE CASTE SYSTEM OF SINDHIS

As post partition Sindhis, we had often heard of Sindhi names/labels like Amils, Bhaibands, Sindhiwarkis, Hyderabadis and so on, but could not make sense of these so called ‘castes’ of the community. Sindhishaan requested veteran researcher Shri Sahib Bijani to simplify and explain the various ‘types’ to the Sindh community. Here is a summary of the extensive research conducted by Shri Bijani.

Sindhis don’t follow any caste system, but there are certain loosely defined ‘castes’ or ‘zaats’ that are distinct from each other as they have come to be associated with distinct cultural and behavioural characteristics. These qualities or traits arose either from their professional differences or from the cities and places of living. For example Hyderabadis are known because they lived in Hyderabad which was comparatively an advanced and prosperous city. Similarly Shikarpuris are people from Shikarpur. This way there are many classifications in the Sindhi community. We have tried to enumerate some of the better known types in this article.

AMILS – The word Amil comes from amal which means to practice. These are Hindu Kshatriyas who worked as accountants in the governments of Mirs and Kalhodas in Sindh. Nowadays their descendants are also known as Amils even though they may not be in service. Amils residing in Hyderabad would be known as Hyderabadi Amils. Some of the Amils also resided in Khairpur, Larkana and Sevanh. Hyderabadis are supposed to be of a higher Zaat, well-educated and fair skinned because the city of Hyderabad in those days was an education and cultural hub.

BHAIBANDS – In Sindh, the business class of Sindhis was known as Bhaibands. These people were into trading and business activities in the kingdom of the Mirs. It would be possible to find one Amil brother and one Bhaiband brother in the same household. In those days Amils would marry only Amils and Bhaibands would marry only Bhaibands. Nowadays even though they may be in service, yet they are known as Bhaibands if their ancestors belonged to this caste.

BHAGNARIS – There were two small villages in Baluchistan known as Bhag and Nari which explains the name of this Bhagnari community. They were the community of dry fruits and spice merchants of those days. Some Bhagnaris were also wine merchants. They strictly married in their own community. Some of the famous Bhagnaris are Popleys, Nanomal Issardas and so on.

MASANDS – Masands were appointed to spread Sikhism by the fourth Guru, Guru Ramdas. They would spread the message of Gurbani in small towns and villages and collect funds. Then on Diwali day they would go and meet their Guru and hand over the collection. They would then be honoured by their Guru. Even today there are around 300 Masands in India; some of them are brilliant educationists and social workers.

There are many more such Jaatis in Sindhis and it is not possible to describe each and everyone in this small article. Efforts must be made to research, classify and tabulate these various castes and sub-castes because it has importance for the future generation.

BHATIAS – Bhatias are descendants of Shri Krishna. There are thousands of Sindhi Bhatias all over the world today. They usually marry among themselves and are strict vegetarians. Many don’t even eat onions and garlic. Some of their sub-castes are Gajria, Kajria, Parmal etc.

LOHANAS – Lohanas are the descendants of Luv, the son of Bhagwan Ramchandra. They are the Kshatriyas who lived in an iron fort built by them in Punjab known as Loh-Ghar, which later came to be known as Lahore. They came to Sindh from Lahore from where many Lohanas migrated to Kutch. They are usually engaged in trading and other business.

CHHAPRUS – The word Chhapru comes from the word Chhappar, meaning “mountain”. These people usually lived in the mountain regions in Sindh and later came down to stay in Karachi. Chhaprus have followed their own distinct rituals and customs. Some of the Chhaprus are also known as Saprus.

SINDHWARKIS – Sindhwarkis are those Bhaibands of Sindh who traded in the materials made in Sindh and then exported it. In 1843, the British conquered Sindh and at that time, the Hyderabadi Bhaibands supplied the materials for daily needs to the British soldiers. Because of their contact with the British army they supplied all types of material to them, even from the villages of Sindh. Then these Bhaibands went to Bombay, from there to Columbia and Rangoon. In 1869 the Suez Canal was opened and many Sindhwarkis went to Europe and Singapore and then spread all over the world, and began trading from many other ports and cities.

Friday, June 3, 2016

प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली

*"प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली"*

पानी में गुड डालिए,
बीत जाए जब रात!
सुबह छानकर पीजिए,
अच्छे हों हालात!!

धनिया की पत्ती मसल,
बूंद नैन में डार!
दुखती अँखियां ठीक हों,
पल लागे दो-चार!!

ऊर्जा मिलती है बहुत,
पिएं गुनगुना नीर!
कब्ज खतम हो पेट की,
मिट जाए हर पीर!!

प्रातः काल पानी पिएं,
घूंट-घूंट कर आप!
बस दो-तीन गिलास है,
हर औषधि का बाप!!

ठंडा पानी पियो मत,
करता क्रूर प्रहार!
करे हाजमे का सदा,
ये तो बंटाढार!!

भोजन करें धरती पर,
अल्थी पल्थी मार!
चबा-चबा कर खाइए,
वैद्य न झांकें द्वार!!

प्रातः काल फल रस लो,
दुपहर लस्सी-छांस!
सदा रात में दूध पी,
सभी रोग का नाश!!

दही उडद की दाल सँग,
पपीता दूध के संग!
जो खाएं इक साथ में,
जीवन हो बदरंग!!

प्रातः- दोपहर लीजिये,
जब नियमित आहार!                                                  तीस मिनट की नींद लो,
रोग न आवें द्वार!!

भोजन करके रात में,
घूमें कदम हजार!
डाक्टर, ओझा, वैद्य का ,
लुट जाए व्यापार !!

देश,भेष,मौसम यथा,
हो जैसा परिवेश!
वैसा भोजन कीजिये,
कहते सखा सुरेश!!

इन बातों को मान कर,
जो करता उत्कर्ष!
जीवन में पग-पग मिले,
उस प्राणी को हर्ष!!

घूट-घूट पानी पियो,
रह तनाव से दूर!
एसिडिटी, या मोटापा,
होवें चकनाचूर!!

अर्थराइज या हार्निया,
अपेंडिक्स का त्रास!
पानी पीजै बैठकर, 
कभी न आवें पास!!

रक्तचाप बढने लगे,
तब मत सोचो भाय!
सौगंध राम की खाइ के,
तुरत छोड दो चाय!!

सुबह खाइये कुवंर-सा,
दुपहर यथा नरेश!
भोजन लीजै रात में,
जैसे रंक सुरेश!!

देर रात तक जागना,
रोगों का जंजाल!
अपच,आंख के रोग सँग,
तन भी रहे निढाल!!

टूथपेस्ट-ब्रश छोडकर,
हर दिन दोनो जून!
दांत करें मजबूत यदि,
करिएगा दातून!!

हल्दी तुरत लगाइए,
अगर काट ले श्वान!
खतम करे ये जहर को,
कह गए कवि सुजान!!

मिश्री, गुड, खांड,
ये हैं गुण की खान!
पर सफेद शक्कर सखा,
समझो जहर समान!!

चुंबक का उपयोग कर,
ये है दवा सटीक!
हड्डी टूटी हो अगर,
अल्प समय में ठीक!!

दर्द, घाव, फोडा, चुभन,
सूजन, चोट पिराइ!
बीस मिनट चुंबक धरौ,
पिरवा जाइ हेराइ!!

हँसना, रोना, छींकना,
भूख, प्यास या प्यार!
क्रोध, जम्हाई रोकना,
समझो बंटाढार!!

सत्तर रोगों कोे करे,
चूना हमसे दूर!
दूर करे ये बाझपन,
सुस्ती अपच हुजूर!!

यदि सरसों के तेल में,
पग नाखून डुबाय!
खुजली, लाली, जलन सब,
नैनों से गुमि जाय!!

भोजन करके जोहिए,
केवल घंटा डेढ!
पानी इसके बाद पी,
ये औषधि का पेड!!

जो भोजन के साथ ही,
पीता रहता नीर!
रोग एक सौ तीन हों,
फुट जाए तकदीर!!

पानी करके गुनगुना,
मेथी देव भिगाय!
सुबह चबाकर नीर पी,
रक्तचाप सुधराय!!

अलसी, तिल, नारियल,
घी सरसों का तेल!
यही खाइए नहीं तो,
हार्ट समझिए फेल!!

पहला स्थान सेंधा नमक,
पहाड़ी नमक सु जान!
श्वेत नमक है सागरी,
ये है जहर समान!!

तेल वनस्पति खाइके,
चर्बी लियो बढाइ!
घेरा कोलेस्टरॉल तो,
आज रहे चिल्लाइ!!

अल्यूमिन के पात्र का,
करता है जो उपयोग!
आमंत्रित करता सदा ,
वह अडतालीस रोग!!

फल या मीठा खाइके,
तुरत न पीजै नीर!
ये सब छोटी आंत में,
बनते विषधर तीर!!

चोकर खाने से सदा,
बढती तन की शक्ति!
गेहूँ मोटा पीसिए,
दिल में बढे विरक्ति!!

नींबू पानी का सदा,
करता जो उपयोग!
पास नहीं आते कभी,
यकृति-आंत के रोग!!

दूषित पानी जो पिए,
बिगडे उसका पेट!
ऐसे जल को समझिए,
सौ रोगों का गेट!!

रोज मुलहठी चूसिए,
कफ बाहर आ जाय!
बने सुरीला कंठ भी,
सबको लगत सुहाय!!

भोजन करके खाइए,
सौंफ,  गुड, अजवान!
पत्थर भी पच जायगा,
जानै सकल जहान!!

लौकी का रस पीजिए,
चोकर युक्त पिसान!
तुलसी, गुड, सेंधा नमक,
हृदय रोग निदान!!

हृदय रोग, खांसी और
आंव करें बदनाम!
दो अनार खाएं सदा,
बनते बिगडे काम!!

चैत्र माह में नीम की,
पत्ती हर दिन खावे !
ज्वर, डेंगू या मलेरिया,
बारह मील भगावे !!

सौ वर्षों तक वह जिए,
लेत नाक से सांस!
अल्पकाल जीवें, करें,
मुंह से श्वासोच्छ्वास!!

सितम, गर्म जल से कभी,
करिये मत स्नान!
घट जाता है आत्मबल,
नैनन को नुकसान!!

हृदय रोग से आपको,
बचना है श्रीमान!
सुरा, चाय या कोल्ड्रिंक,
का मत करिए पान!!

अगर नहावें गरम जल,
तन-मन हो कमजोर!
नयन ज्योति कमजोर हो,
शक्ति घटे चहुंओर!!

तुलसी का पत्ता करें,
यदि हरदम उपयोग!
मिट जाते हर उम्र में,
तन के सारे रोग!!
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