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Wednesday, February 22, 2017

Diseases Reason and Solutions in Hindi

1- 90 प्रतिशत रोग केवल पेट से होते हैं। पेट में कब्ज नहीं रहना चाहिए। अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेगी।
2- कुल 13 अधारणीय वेग हैं
3-160 रोग केवल मांसाहार से होते है
4- 103 रोग भोजन के बाद जल पीने से होते हैं। भोजन के 1 घंटे बाद ही जल पीना चाहिये।
5- 80 रोग चाय पीने से होते हैं।
6- 48 रोग ऐलुमिनियम के बर्तन या कुकर के खाने से होते हैं।
7- शराब, कोल्डड्रिंक और चाय के सेवन से हृदय रोग होता है।
8- अण्डा खाने से हृदयरोग, पथरी और गुर्दे खराब होते हैं।
9- ठंडेजल (फ्रिज)और आइसक्रीम से बड़ीआंत सिकुड़ जाती है।
10- मैगी, गुटका, शराब, सूअर का माँस, पिज्जा, बर्गर, बीड़ी, सिगरेट, पेप्सी, कोक से बड़ी आंत सड़ती है।
11- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति मन्द हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है।
12- बाल रंगने वाले द्रव्यों(हेयरकलर) से आँखों को हानि (अंधापन भी) होती है।
13- दूध(चाय) के साथ नमक(नमकीन
पदार्थ) खाने से चर्म रोग हो जाता है।
14- शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के तेलों से बाल पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं।
15- गर्म जल से स्नान से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है और
शरीर कमजोर हो जाता है। गर्म जल सिर पर डालने से आँखें कमजोर हो जाती हैं।
16- टाई बांधने से आँखों और मस्तिश्क हो हानि पहुँचती है।
17- खड़े होकर जल पीने से घुटनों(जोड़ों) में पीड़ा होती है।
18- खड़े होकर मूत्रत्याग करने से रीढ़
की हड्डी को हानि होती है।
19- भोजन पकाने के बाद उसमें नमक डालने से रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) बढ़ता है।
20- जोर लगाकर छींकने से कानों को क्षति पहुँचती है।
21- मुँह से साँस लेने पर आयु कम होती है।
22- पुस्तक पर अधिक झुकने से फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षय(टीबी) होने का डर रहता है।
23- चैत्र माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है मलेरिया नहीं होता है।
24- तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता है।
25- मूली प्रतिदिन खाने से व्यक्ति अनेक रोगों से मुक्त रहता है।
26- अनार आंव, संग्रहणी, पुरानी खांसी व हृदय रोगों के लिए सर्वश्रेश्ठ है।
27- हृदयरोगी के लिए अर्जुनकी छाल, लौकी का रस, तुलसी, पुदीना, मौसमी,
सेंधा नमक, गुड़, चोकरयुक्त आटा, छिलकेयुक्त अनाज औशधियां हैं।
28- भोजन के पश्चात् पान, गुड़ या सौंफ खाने से पाचन अच्छा होता है। अपच नहीं होता है।
29- अपक्व भोजन (जो आग पर न पकाया गया हो) से शरीर स्वस्थ रहता है और आयु दीर्घ होती है।
30- मुलहठी चूसने से कफ बाहर आता है और आवाज मधुर होती है।
31- जल सदैव ताजा(चापाकल, कुएं
आदि का) पीना चाहिये, बोतलबंद (फ्रिज) पानी बासी और अनेक रोगों के कारण होते हैं।
32- नीबू गंदे पानी के रोग (यकृत, टाइफाइड, दस्त, पेट के रोग) तथा हैजा से बचाता है।
33- चोकर खाने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। इसलिए सदैव गेहूं मोटा ही पिसवाना चाहिए।
34- फल, मीठा और घी या तेल से बने पदार्थ खाकर तुरन्त जल नहीं पीना चाहिए।
35- भोजन पकने के 48 मिनट के
अन्दर खा लेना चाहिए। उसके पश्चात्
उसकी पोशकता कम होने लगती है। 12 घण्टे के बाद पशुओं के खाने लायक भी नहीं रहता है।। 36- मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से पोशकता 100% कांसे के बर्तन
में 97% पीतल के बर्तन में 93% अल्युमिनियम के बर्तन और प्रेशर कुकर में 7-13% ही बचते हैं।
37- गेहूँ का आटा 15 दिनों पुराना और चना, ज्वार, बाजरा, मक्का का आटा 7 दिनों से अधिक पुराना नहीं प्रयोग करना चाहिए।
38- 14 वर्श से कम उम्र के बच्चों को मैदा (बिस्कुट, बे्रड, समोसा आदि)
कभी भी नहीं खिलाना चाहिए।
39- खाने के लिए सेंधा नमक सर्वश्रेश्ठ होता है उसके बाद काला नमक का स्थान आता है। सफेद नमक जहर के समान होता है।
40- जल जाने पर आलू का रस, हल्दी, शहद, घृतकुमारी में से कुछ भी लगाने पर जलन ठीक हो जाती है और फफोले नहीं पड़ते।
41- सरसों, तिल,मूंगफली या नारियल का तेल ही खाना चाहिए। देशी घी ही खाना चाहिए है। रिफाइंड तेल और
वनस्पति घी (डालडा) जहर होता है।
42- पैर के अंगूठे के नाखूनों को सरसों तेल से भिगोने से आँखों की खुजली लाली और जलन ठीक हो जाती है।
43- खाने का चूना 70 रोगों को ठीक करता है।
44- चोट, सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा होने पर उस पर 5-20 मिनट तक चुम्बक रखने से जल्दी ठीक होता है।
हड्डी टूटने पर चुम्बक का प्रयोग करने से आधे से भी कम समय में ठीक होती है।
45- मीठे में मिश्री, गुड़, शहद, देशी(कच्ची) चीनी का प्रयोग करना चाहिए सफेद चीनी जहर होता है।
46- कुत्ता काटने पर हल्दी लगाना चाहिए।
47-बर्तन मिटटी के ही परयोग करन चाहिए।
48- टूथपेस्ट और ब्रश के स्थान पर
दातून और मंजन करना चाहिए दाँत मजबूत रहेंगे।
(आँखों के रोग में दातून नहीं करना)
49- यदि सम्भव हो तो सूर्यास्त के पश्चात् न तो पढ़े और लिखने का काम तो न ही करें तो अच्छा है।
50- निरोग रहने के लिए अच्छी नींद और अच्छा(ताजा) भोजन अत्यन्त
आवश्यक है।
51- देर रात तक जागने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कमजोर हो जाती है। भोजन का पाचन भी ठीक से नहीं हो पाता है आँखों के रोग भी होते हैं।
52- प्रातः का भोजन राजकुमार के
समान, दोपहर का राजा और रात्रि का भिखारी के समान।🙏😊

👉आशा हैे केवल फॉरवर्ड करने के अलावा स्वयं के परिवार में भी इसे लागु करेंगे।

Monday, February 20, 2017

The reason behind Sindhi Surnames

Why do many Sindhis have their surname end with "ani". Is there any logic behind it?

Yes, There is a Logic Behind this
Here's a piece of information picked up from another sites, which all Sindhis and communities should know!

Unlike other Hindus of India, who have a 'gotra', Sindhis often have a 'nukh', which means roots. This is much of the reason why Hindu Sindhi surnames end in 'ani'- which means 'anshi', derived from the Sanskrit word 'ansh', which means 'descendence'. So if someone returned or came from Georgia, his nukh would be 'jeorus', and his surname could be coined after the family head's name (subject to change every seven generations), eg: your family head 7 generations back had the name: 'Tolaram', then your surname would be TOL-ANI. Same goes for all the ani's in the world. May the person be from Iran, Iraq, Saudi Arabia, Italy, Anatolia, Armenia or wherever, as this 'ani' is only unique to Sindhi civilization.

Another variation does exist to this norm. Many surnames of northern Sindh eg: (Shikarpur) and Multan (ancient name: Sawarawkistan) end in 'ja', eg: Ahuja, Raheja, Hinduja etc. 'Ja' in Sindhi means 'of', so if a person belonged to the village of 'Junay', then their surname would be 'Juneja'.
Now the Question arises, why is there a need to add 'ani' or 'ja' to Sindhi surnames? It's because, post Mahmud Ghaznavi invasion, many Sindhis had escaped. They were called 'Banjaras' in India, Sinti in distant European lands, and 'Sintowee' in Mongolia and China. 'Gypsy' is a term used for them frequently. However, many Sintis awaited the end of Ghaznavid rule, so that they could return back. Many did return back, but many were pushed westwards, and thus have never returned. Those who managed to return are called 'AARYAN', which is a term different to the sanskratic version 'ARYA'.

AARYAN in Sindhi means those who have come back. These tribes added 'ani'(southern sindh) and 'ja' (northern sindh) to their names. Already an Indo-Iranian race, the Sindhi Hindus, once becoming Sintis in distant lands acquiring a range of cultural habits of different cultures, and furthermore with many inter-cultural marriages, the fabric in the race of Sindhis varied tremendously. Different dialects in Sindh were born, and different dressing sense as well. The Aamil Sindhi for example were a cross-breed of Indo-Iranian Sindhis and Alexandrian Greeks, and thus emphasized more on education.

The Bhaibund and Shikarpuri Sindhis, who returned back (Sintis) from Armenia, Turkey and Egypt, brought with them business skills and tactics. There are many more variations in the community, and it is quite difficult to identify who belongs where. Thus, 'nukhs' are the only way to identify one's roots. Furthermore, due to constant upheaval of Sindhis, and further migration and amalgamation with different migrant tribes, a lot has changed, and Sindhi music and dance post Islamization has not remained the same. In such a scenario the Sinti music of the Gypsies can be called the pure sindhi dance and music. Islamization of Sindh further brought about Sufism, which further enhanced the culture of Sindh
As the size of families grew within the Gotra, need arose to identify each family by name. Each family was alotted a Nukh (Name), which helped to identify one another. From Nukh one knew which Gotra one belonged to.

In Sanskrit word for Nukh is Lakh, meaning Laksh which in Sindhi is pronounced Lakh, meaning to know from where one hails.

Gautam Rishi’s Gotra were allotted Nukh called AVER, UDECH & AAEN, who were Brahmins.

Khatris and Vaishas had their own Goters. They were also allotted Nukhs.

Advani’s of Hyderabad Sind carry Nukh named "Maghoo Khatri". Ahuja & Makhija are names of their Nukh.

Wednesday, February 1, 2017

Help the children grow strong - An Illistratiob

Do Read... its beautiful !🐛🐝

The best message I have read
in a while

A man, an avid Gardener saw a small Butterfly laying few eggs in one of the pots in his garden.

Since that day he looked at the egg with ever growing curiosity and eagerness.

The egg started to move and shake a little.

He was excited to see a new life coming up right in front of his eyes.

He spent hours watching the egg now.

The egg started to expand and develop cracks.

A tiny head and antennae started to come out ever so slowly.

The man's excitement knew no bounds.

He got his magnifying glasses and sat to watch the life and body of a pupa coming out.

He saw the struggle of the tender pupa and couldn't resist his urge to "HELP".

He went and got a tender forceps to help the egg break, a nip here, a nip there to help the struggling life and the pupa was out.

The man was ecstatic!

He waited now each day for the pupa to grow and fly like a beautiful butterfly, but alas that never happened.

The larvae pupa had a oversized head and kept crawling along in the pot for the full 4 weeks and died!

Depressed the man went to his botanist friend and asked the reason.

His friend told him the struggle to break out of the egg helps the larvae to send blood to its wings and the head push helps the head to remain small so that the tender wings can support it thru its 4 week life cycle.

In his eagerness to help, the man destroyed a beautiful life!

Struggles help all of us, that's why a bit of effort goes a long way to develop our strength to face life's difficulties!

As parents, we sometimes go too far trying to help and protect our kids from life's harsh realities and disappointments.

We don't want our kids to struggle like we did.

Harvard psychiatrist Dr. Dan Kindlon says that over-protected children are more likely to struggle in relationships and
with challenges.

We're sending our kids the message that they're not capable of helping themselves.

To quote clinical psychologist,
Dr. Wendy 's Moral:

"It  is  Our Job  to  prepare  Our  Children  for  the  Road & Not  prepare  the  Road for  Our Children"

All parents - Please do read and share

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